Saturday, 6 August 2011

तुम्हारे लिए



दसों दिशाओं में छा गयी थी
अरुणाभा
तुम्हारी हंसी से उस दिन
खूब हंसे थे तुम 
जाने किस बात पर
मन आंगन में  फैल गयी थी घूप
बरसी थी चांदनी इतनी
कि
बची है शीतलता आज भी
इस
जलते
सफर में
कितना कुछ रह गया
तुम्हारा मेरे पास
सारा का सारा ही शायद
जबकि खड़े हो तुम दूर
अलग व्यक्तित्व बने
अजनबी  निर्लिप्त
क्या कुछ भी शेष नहीं रहा
मेरा तुम्हारे पास
मैं तो इतना रह गयी हूँ तुम्हारे पास कि
जरा भी नहीं बची हूँ
खुद के लिए
पुरानी किताब के
पियराये पन्नों मे
आज
मिले हैं कुछ
सूर्ख गुलाब
हरे हो गए
अधूरे ख्वाब
 फिर से

1 comment:

  1. अंततः प्रेम ही बचायेगा हमें....
    बहुत सधी और सुंदर कविताएँ..

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