Friday, 30 September 2011

घास छीलती स्त्री

कई दिन से देख रही हूँ
सामने के मैदान में 
घास छीलती स्त्री को 
साठ की उम्र 
झुकी कमर व सफेद बाल 
हाथों में कमाल इतना 
कि एक पल में ही 
लगा देती है घास का ढेर 
'सहज होता है घास छीलना' 
सोचा था बचपन में मैंने 
छीनकर सुरसतिया के हाथ से खुरपी 
छीलना चाहा था घास 
और घायल करके अंगुलियाँ
पकड़ लिया था कान  |
'पढ़ोगी नहीं तो घास छीलोगी' 
मास्टर साहब की ये बात
 हमेशा याद रखी मैंने 
घास छिलती हुई स्त्री ने 
शायद नहीं सुनी  होगी 
अपने मास्टर की बात 
पास जाकर पूछती हूँ 
स्त्री व्यंग्य से  
देखती है कुछ पल मुझे 
फिर पैर के पंजों पर
 तेजी से सरकती 
घास का लगाने लगती है यूँ ढेर 
मानों ढेर कर रही हो 
यह व्यवस्था |



1 comment:

  1. bahut khoob lika hai aur muhavare ko bhi charitarth kiya hai........

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