Thursday, 3 November 2011

शापित











एक थे हम
आजाद
सुखी
पूर्ण
विचरण करते
प्रकृति के बीच
दो करके
भेज दिए गए
धरती पर 
पराधीन
दुखी
अपूर्ण
होकर तड़पने लगे
जब भी हमने देखा
एक-दूसरे को
एक हो जाना चाहा
शैतान आ खड़ा हुआ
हमारे बीच
फिर भी कम नहीं हुईं
हमारी मिलने की कोशिशें
अनेक नाम
अनेक युग
देशकाल
मगर रहे हम वही के वही
शापित
दो बने रहने के लिए
जाने कितनी बाधाएं
विमर्श मौजूद हैं
आज भी
हम दोनों के बीच
कम नहीं हुई मगर चाहतें
आएगा एक दिन
जब हम फिर होंगे एक
आजाद
सुखी
पूर्ण
पहले की तरह
विचरण करते
प्रकृति के बीच ||

1 comment:

  1. achchha laga apka page dekh kar ....achchha pryas ....fursat ke kshano me aur dekhta hu ....

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