Friday, 9 December 2011

जाड़े की धूप

एक टुकड़ा जाड़े की धूप 
दरवाजे से 
मेरे कमरे में आ गयी है 
धूप 
प्रिय है..गुनगुनी है 
चटख है ..अपराह्न की है 
ताजा है ..
कमरे का कोना-कोना उजास है 
मैं अपने घर की 
हर वस्तु सरलता से देखती हूँ 
पहचानती हूँ 
अपने करीब पाती हूँ 
धूप 
गौरेया है 
निश्शंक कमरे में 
फुदकती है 
चहकती है 
मीठी सुगन्धि का फूल है 
कमरा भर महकती है 
धूप 
थोड़ी देर बाद चली जाएगी 
फिर बढ़ जाएगा
कमरे का अँधेरा ...सीलन 
धूप 
कभी-कभी आती है 
कमरे का जी बहलाती है 
फिर उसे उदास छोड़ जाती है 
मेरा मन 
धूप के उस टुकड़े का 
इंतजार करता है | 

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