Saturday, 10 December 2011

बोनसाई

चाहती हूँ मैं 
छतनार वृक्ष होना 
थके राही विश्राम पायें 
जिसकी छाँह में 
गिलहरियां दौड़े 
जिसके मोटे तनों पर 
पक्षी घोंसले बनायें 
सूखी डालियाँ,पीले पत्ते 
गरीबों का ईंधन बनें 
जड़ें अन्वेषण करें 
दूर तक जाकर भोजन की 
गहरे पैठें धरती में 
मीठे पानी की तलाश में 
पर कमरे में हरियाली कैद करने की 
तुम्हारी लालसा ने 
बनाया मुझे बोनसाई 
गमले-भर मिट्टी 
अंजुरी-भर खाद 
चुल्लू-भर पानी 
विस्तार की सारी आकांक्षाएं 
इन्हीं सीमाओं में 
कैद कर दी गईं
कमरे के बाहर का आकाश 
हवा,धूप,बारिश 
झूमते सजातीय बन्धु 
सब पराये कर दिए गए 
जब भी मैंने बाहें फैलानी चाहीं 
कस दिया तुमने 
धातु के तार में 
कैंची चलाई 
मेरी पीड़ा सुने वगैर 
पक्षी नहीं आते घोंसला बनाने 
मेरी बाहें सूनी रह जाती हैं 
तुम्हारे ड्राइंगरूम की 
शोभा बनी मैं बोनसाई 
तुम्हारे इच्छाओं की दासी | 

1 comment:

  1. एक बहुत अच्छी कविता। बधाई !

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