Monday, 13 February 2012


प्रेम
एक ने कहा –एक ही बार होता है प्रेम
कहा दूसरे ने –कई बार हो सकता है प्रेम
उसी भावना और समर्पण के साथ
जैसे हुआ हो पहली बार
पहला चिल्लाया-लस्ट है ऐसा प्रेम
दूसरे ने मुस्कुराकर इसे ही प्रकृति बताया
सोचने लगी मैं -भिन्नता कहाँ है दोनों की सोच में
प्रेम तो होता है सच ही एक
पहला ..दूसरा या तीसरा नहीं
अमूर्त प्रेम की चाह में
बढ़ जाए भले ही मूर्त प्रेमियों की संख्या
चेहरा बदल जाए
बदल जाए देह और अभिव्यक्ति
प्रेम नहीं बदलता
भाग्यवान होते हैं वे
मिल जाता है जिन्हें साबुत प्रेम पहली ही बार
टुकड़े –टुकड़े में मिलता है जिसे प्रेम
जोड़कर बनानी होती है उसे 
प्रेम की साबुत मूर्ति एक
प्रेम कभी लस्ट नहीं होता |

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