Sunday, 4 March 2012

पेड़ और हरा पत्ता



हरा पत्ता 
लाख छटपटाए
पेड़ भी चाहे
नहीं जुड़ सकते दोनों
अलग होने के बाद
पत्तों की भीड़ में भी
कसकता रहता है पेड़ का मन
उस पत्ते के लिए
जो उसकी ही देह का हिस्सा था
पत्ते को भी भटकना होता है
सूखना ही होता है समय से पहले
उड़ना होता है निर्मम हवा के संग
फिर नदी..पोखर..नाला या खेत
जैसी हो उसकी नियति
वैसे तो पूरी उम्र जीने के बाद
हर पत्ते की यही है परिणति
जानता है पेड़
फिर भी टूटता है
जब कोई हरा पत्ता
फूट-फूटकर रोता है पेड़ |

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