Wednesday, 22 February 2017

मैं शायर तो नहीं फिर भी ...

वैसे तो रहती है रूह देह में 
कहाँ देख पाती देह रूह को।

चक्रव्यूह से मैं निकल ना सकी कभी
एक व्यूह काटा दूसरा सामने आ गया।

मुझसे ही दूर खड़ी है जिंदगी
हैरान हूं क्या ही है जिंदगी।

प्रेम कहाँ मिल पाता है सबको 
जिन्हें मिला मुबारक हो उनको|

जो सोचकर किया जाए नादानियाँ होंगी
प्रेम कहाँ सोच-समझकर किया जाता है।

धरती का धैर्य छूटे आकाश की मर्यादा
मौसमों के रंग बदले पर हम न बदलें।

उसको जाना है समझा है तभी तो ख्वाबों में सजाया है
कुछ तो ख़ास बात है उसमें जो वही मन को भाया है|

ये किसका चेहरा किताबों में है मुस्कुराता कौन गुलाबों में है 
किसकी खुशबू से मुत्तर हुई आखिर अब ये कौन मेरे ख्वाबों में है |

Wednesday, 8 February 2017

प्रेम और आज का पुरूष


प्रेम जीवन का रंग महोत्सव है |कोमल अनुभूतियों का समुच्चय |स्त्री-पुरूष के बीच दुःख-सुख,संयोग-वियोग,राग-द्वेष,त्वरा-आवेग,उद्वेलन सब का आवर्तन-प्रत्यावर्तन |पर स्वभावतः परूष[कठोर]आज का पुरूष स्त्री की तरह शिद्दत से प्रेम नहीं कर पा रहा है |देह-मन-मस्तिष्क की अलग बुनावट के कारण भी उसके प्रेम की प्रकृति व अभिव्यक्ति में अंतर है |उसका प्रेम देह-प्रधान है |साध्य नहीं साधन है |जीवन की अन्य जरूरतों की तरह एक जरूरत|,स्व-समर्पण नहीं |प्रेम में सौंदर्य,नवीनता व रोमांच उसे पसंद है,इसलिए उसके प्रेम में प्राय
गम्भीरता,स्थायित्व,एकनिष्ठता व त्याग का अभाव दीखता है |एकाधिक प्रेम में उसे कोई नैतिक बाधा नहीं |आज का पुरूष जिस मशीनी युग में जी रहा है,उसका प्रभाव उसके प्रेम पर भी दिख रहा है|उसके भीतर की संवेदना,कोमलता का लोप होता जा रहा है |इसका परिणाम यह है कि अब वह प्रेम को जीता नहीं,प्रेम का कोरा भ्रम पालता है|प्रेम के लिए यह संकट का समय है |प्रेम की कमी से मनुष्यता खतरे में पड़ सकती है |

यद्यपि आज का पुरूष कल से ज्यादा प्रेम का नाम ले रहा है,उसके प्रेम में देह पाने की लालसा ही प्रधान है |हद तो यह है कि वह बाजार में भी प्रेम तलाशने लगा है |रोना-झींकना,शिकवा-शिकायत,मान -मनौवल व वर्षों प्रेम के पीछे भागना न तो उसे पसंद है,ना ही उसके पास इन चींजों के लिए वक्त है|करियर को बनाने-संवारने,फिर सँभालने में उसकी ऊर्जा व समय का बड़ा हिस्सा निकल जाता है,ऐसे में वह ऐसा प्रेम चाहता है,जो उसे तनाव-मुक्त रखकर बुलंदी तक पहुँचने में मदद करे |यही वजह है कि आज का पुरूष प्रेम को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करने से बाज नहीं आता |यह दुखद है कि दो दिलों की अटूट पारस्परिक आत्मीयता एवं आपसी समझ प्रेम का मूल स्वरूप नहीं रहा |

Saturday, 4 February 2017

बसंत गीत

काँटों में सुंदर फूल खिले 

तुम जब यूँ मुझसे आके मिले
मह-मह महका मोजर-सा तन 
चह-चह चहका गौरेया-मन
देखो ना सहजन सहज हुआ
अधरों के भीगे पात हिले
इक पतझर-सा आ ठहरा था
तुम बिन जीवन के उपवन में
अब आए हो तो देखो ना
कलियाँ भौंरों से गले मिले
धरती की धानी चूनर पर
गुलमोहर टेसू दमक उठे
फिर हुए शराबी आम्र-कुञ्ज
मदमस्त हवा के केश खुले |

Thursday, 2 February 2017

स्त्री विमर्श और प्रेम

स्त्री विमर्श मेँ पुरूष से विरोध दिखता है और प्रेम मेँ पुरूष की जरूरत है |प्रेम मेँ अपने स्वतंत्र अस्तित्व का विलय करना होता है [जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहि|] जबकि विमर्श स्वतंत्र अस्तित्व की मांग करता है |विमर्श कहता है मुझे पहचान चाहिए, अलग पहचान,स्वतंत्र पहचान|प्रेम कहता है हम दो हैं ही नहीं | प्रेम दिल की जरूरत है विमर्श दिमाग की |
स्त्री पर हमेशा दिल ही भारी होता है |पुरूष प्रेम भी दिमाग से करता है ,भले ही वह दिल की बात करे | फिर दोनों मेँ मेल क्योंकर संभव है ?
प्रश्न यह है कि क्या सच ही स्त्री विमर्श मेँ पुरूष या प्रेम के लिए जगह नहीं ?मेरे विचार से यह सही नहीं है |दरअसल स्त्री विमर्श को पुरूष या प्रेम से विरोध है ही नहीं |विरोध है तो इस बात से कि प्रेम मेँ जनतंत्र नहीं है |प्रेम के जनतंत्र मेँ दो स्वतंत्र व्यक्तित्व वाले स्त्री-पुरूष संयुक्त हो सकते हैं |एक दूसरे से प्रेम कर सकते हैं पर परंपरा से जो प्रेम हमें प्राप्त है उसमें स्त्री को अपना स्वतंत्र अस्तित्व मिटाना पड़ता है ,जबकि पुरूष अपने “””मैं” को साथ लेकर चलता है |प्रेम मेँ स्त्री-पुरूष मेँ बराबरी का संबंध होना चाहिए , पर ऐसा होता नहीं |प्रेम की सारी शर्ते स्त्री के लिए होती हैं –एकनिष्टता ,त्याग,समर्पण ,बंधन सब| पुरूष के लिए नहीं ,फिर उनका प्रेम कैसे परवान चढ़ सकता है ?यही कारण है शुरू मेँ जिसे प्रेम समझा जाता है ,बाद मेँ कटुता[कभी शत्रुता] मेँ बदल जाता है |स्त्री शालीन होती है इसलिए वह अपनी कटुता भले ही प्रकट न करे और चुपचाप अपने सम्बन्धों का निर्वाह किए जाए ,पर उसके मन मेँ विद्रोह पनपता रहता है और ज्यों ही उसके जीवन मेँ किसी दूसरे प्रेम का प्रवेश होता है वह बावली हो जाती है |समाज मेँ न तो उसके विद्रोह को अच्छा माना जाता है न दूसरे प्रेम के प्रवेश को |उसके प्रेम को वासना’[लस्ट] कहकर सर्वत्र उसकी निंदा होती है|उसे कुलटा,बदचलन कहा जाता है |कई देशों मेँ तो उसे पत्थर मार-मार कर मार डालते हैं |शास्त्रों मेँ भी ऐसी स्त्री को जीवित जमीन मेँ गाड़ने या कुत्तों से नुचवाने की आज्ञा है |कई पंचायतों ने तो दंड स्वरूप ऐसी स्त्री से सामूहिक बलात्कार तक करवाएँ हैं |
लेकिन पुरूष को दूसरे प्रेम की ऐसी सजा कहीं नहीं दी जाती |उसके प्रेम को उतना गलत नहीं माना जाता |कृष्ण के सैकड़ों गोपियों व हजारों रानियों से प्रेम को कौन गलत कहता है ?वे तो अनगिनत बार प्रेम करके भी योगिराज कहलाते रहे |आध्यात्मिक रंग देने वाले इस पर लीपापोती कर देते हैं |वे वेद और उनकी चाओं का बहाना बनाते हैं |आज हम कृष्ण राधा को युगल के रूप मेँ पूजते हैं |उनके प्रेम का हवाला देते हैं पर क्या हमने कभी सोचा कि कृष्ण के मथुरा जा बसने के बाद राधा का क्या हुआ होगा ?क्या उसको अपने उसी पति के साथ शेष जीवन गुज़ारना पड़ा होगा ,जिसके होते हुए भी वे कृष्ण के प्रेम मेँ पड़ी |और क्या सब कुछ जानते हुए भी पति ने उसे अपना लिया होगा |
इस मायने मेँ राम आदर्श प्रेमी थे पर उनके प्रेम पर उनका मर्यादा पुरूषोत्तम अहंकार [मैं]भारी प गया |वे अपने प्रेम पर विश्वास ही नहीं कर सके |उनके मन से संदेह नहीं गया जबकि प्रेम मेँ अविश्वास की कोई जगह नहीं होती |
जैसे आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नए शरीर को धारण करती है उसी प्रकार प्रेम भी उस शरीर को छोड़ देता है जिसमें संवेदनाएँ समाप्त हो जाती हैं |यह उसका हरजाईपन नहीं स्वभाव है इसलिए यह कहना गलत होगा कि प्रेम एक बार या एक से ही हो सकता है |हाँ ,प्रेम में वही ईमानदारी हर बार मौजूद  रहती है जो पहले प्रेम के समय होती है |प्रेम को सिर्फ देह समझने वाले दुबारा प्रेम को लस्ट[वासना] कहते हैं ,उन्हें पता नहीं कि प्रेम आत्मा की प्यास है ,मन की जरूरत है ,देह तो बस माध्यम है|’निरालंब कित धावै के कारण प्रेम को देहधारी की जरूरत पड़ती है ,वरना वह तो अलख निरंजन में भी मगन रह सकता है | प्रेम दो को एक कर देता है उन्हें अर्धनारीश्वर बना देता है |एक बराबर बना देता है |एक को अलग करते ही दूसरा स्वत:समाप्त हो जाता है |दोनों के बीच जरा सी भी खाली जगह नहीं होती ,ऐसे में तीसरे की गुंजाइश कहाँ?प्रेम में विवाद ,संघर्ष ,विमर्श ,अलगाव की जरूरत ही नहीं होती |
प्रेम में भौगोलिक ,सामाजिक,पारिवारिक दूरियाँ कोई मायने नहीं रखतीं |दोनों एक –दूसरे के मन को बिना बताए भी पढ़ सकते हैं |प्रेम में मौन भी मुखर होता है [भरे भौन में करत है नैनन ही सो बात ]|अनकही को भी प्रेमी सुन लेते हैं |कोई भी बाधा प्रेम की धारा को अवरूद्ध नहीं कर सकती |किसी की देह को हासिल करके भी उसका प्रेम नहीं पाया जा सकता क्योंकि प्रेम में हासिल करना जैसा भाव नहीं होता |प्रेम तो खुद को ही समर्पित कर देता है |उसे जीतकर नहीं पाया जा सकता |यही कारण है कि जीवन भर साथ रहने के बाद भी कई दंपति प्रेम का आस्वाद नहीं चख पाते और अंत तक प्रेम के लिए तरसते हैं |कोई –कोई अन्य के साथ पल भर के रिश्ते में सार्थक हो लेते हैं |प्रेम को समझना,समझाना आसान नहीं है|’जो पावै सो जानै’|
स्त्री विमर्श पूछता है स्त्री पर पूर्णाधिकार चाहने वाले पुरूष अन्य स्त्रियॉं से प्रेम कैसे कर सकते हैं ?और दूसरे पुरूष के प्रेम मेँ पड़ी स्त्री को गलत कैसे क सकते हैं ?कैसे एक ही चीज एक के लिए सही दूसरे के लिए गलत हो सकती है ?या तो पुरूष भी समर्पण करे या स्त्री से समर्पण न चाहे |स्त्री की उम्र ज्यादा हो तो हाय-तौबा मच जाती है,जबकि पुरूष के लिए उम्र की कोई शर्त नहीं होती |यह दुहरी नीति क्यों?
पुरूष कहता है कि उसे प्रेरणा के लिए अन्य स्त्री चाहिए| फिर अगर स्त्री प्रेरणा स्वरूप कोई अन्य पुरूष चुने तो यह गलत क्यों ?स्वयं अन्य पुरूष के लिए भी दूसरी स्त्री भी अन्या ही रहती है अनन्या नहीं हो पाती |
प्रेम मेँ जनतंत्र की तरह स्त्री-पुरूष का समान अधिकार होना चाहिए |पर ऐसा नहीं है |प्रेम मेँ पूरी तरह राजतंत्र है | प्रेम में जनतंत्र हो भी कैसे जब समाज मेँ ही स्त्री का जनतंत्र नहीं है |जब तक स्त्री का जनतंत्र नहीं होगा ,प्रेम का जनतंत्र नहीं हो सकता |दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं |यह विभेद मिटेगा तभी यह देश पूर्ण जनतांत्रिक होगा और किसी विमर्श की आवश्यकता नहीं रह जाएगी |



Wednesday, 1 February 2017

प्रेम का आनंद

प्रेम क्या है यह बताना लगभग असम्भव है |कारण यह गूंगे का गुड़ है| देह,मन,आत्मा का ऐसा आस्वाद है जिसे बताने में इंद्रियां चूक जाती हैं अलसा जाती हैं |वे प्रेम के आस्वाद का अनुभव तो करती हैं पर उसी रूप में व्यक्त नहीं कर पातीं |यही कारण है कि आज भी प्रेम अपरिभाषित है ,नव्य है,काम्य है |जीव-जगत का ऐसा कौन सा प्राणी होगा जिसपर इसका जादू नहीं चढ़ता |अबोध हो या सुबोध ,अज्ञ या विज्ञ किसी भी जाति ,धर्म सम्प्रदाय,क्षेत्र ,देश का आदमी हो ,उसकी अपनी बोली-बानी कुछ भी हो,वह प्रेम की भाषा समझता है |प्रेम का स्पर्श देह मन आत्मा को छू लेता है |पेड़-पौधे तक इस स्पर्श को समझते हैं |प्रेम ही सृष्टि का आधार है और उसी के कारण सृष्टि बनी हुई है |सिर्फ बनी हुई ही नहीं सुंदर है |रसपूर्ण, आनंददायक और जीवंत है |यह प्रेम सिर्फ स्त्री-पुरूष के रिश्ते तक सीमित नहीं है, उसका विस्तार वसुधैव कुटुम्बकम है |प्रकृति के कण-कण तक है|पेड़-पौधे ,जीव-जन्तु और पूरी मानव जाति तक है |वह प्रेम ही है जो ईश्वर को जरा -से छाछ के लिए ग्वालिनों के सामने नाचने पर मजबूर कर देता है |मीरा को मूर्ति जीवित पुरूष से ज्यादा प्यारी लगती है |राधा सारे रिश्ते-नाते भूल जाती है |प्रेम बंधन सीमा मर्यादा नहीं मानता |वह स्वयं स्वतंत्र है और सबको स्वतंत्र करता है |बांधना प्रेम का स्वभाव नहीं |प्रेम सुवासित झोके की तरह आता है और तन मन आत्मा को महका कर कहीं और चला जाता है टिकता नहीं बांधते तो रिश्ते हैं |रिश्ते जो प्रेम की वजह से बनते तो हैं पर बाद में बंधन बन जाते हैं |इस बंधन में स्थायित्व तो है पर ताजगी नहीं |उत्फुल्लता नहीं आनंद नहीं |वहाँ जरूरत है निर्भरता है नियम है परम्परा है जिसे न चाहते हुए भी मनुष्य को निभाना पड़ता है |वहाँ अक्सर प्रेम देह तल ही रहता है |देह से चलकर मन तक और फिर आत्मा या ईश्वर तक नहीं पहुँचता |प्रेम के तीन स्तरों तक विरला ही पहुँच पाता है और जो पहुँचता है पर परम आनंद को प्राप्त कर लेता है यह प्रेम का आनंद है |   


जो पावै सो जानै’

जैसे आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नए शरीर को धारण करती है उसी प्रकार प्रेम भी उस शरीर को छोड़ देता है जिसमें संवेदनाएँ समाप्त हो जाती हैं |यह उसका हरजाईपन नहीं स्वभाव है इसलिए यह कहना गलत होगा कि प्रेम एक बार या एक से ही हो सकता है |हाँ ,प्रेम में वही ईमानदारी हर बार मौजूद  रहती है जो पहले प्रेम के समय होती है |प्रेम को सिर्फ देह समझने वाले दुबारा प्रेम को लस्ट[वासना] कहते हैं ,उन्हें पता नहीं कि प्रेम आत्मा की प्यास है ,मन की जरूरत है ,देह तो बस माध्यम है|’निरालंब कित धावै के कारण प्रेम को देहधारी की जरूरत पड़ती है ,वरना वह तो अलख निरंजन में भी मगन रह सकता है | प्रेम दो को एक कर देता है उन्हें अर्धनारीश्वर बना देता है |एक बराबर बना देता है |एक को अलग करते ही दूसरा स्वत:समाप्त हो जाता है |दोनों के बीच जरा सी भी खाली जगह नहीं होती ,ऐसे में तीसरे की गुंजाइश कहाँ?प्रेम में विवाद ,संघर्ष ,विमर्श ,अलगाव की जरूरत ही नहीं होती |

प्रेम में भौगोलिक ,सामाजिक,पारिवारिक दूरियाँ कोई मायने नहीं रखतीं |दोनों एक –दूसरे के मन को बिना बताए भी पढ़ सकते हैं |प्रेम में मौन भी मुखर होता है [भरे भौन में करत है नैनन ही सो बात ]|अनकही को भी प्रेमी सुन लेते हैं |कोई भी बाधा प्रेम की धारा को अवरूद्ध नहीं कर सकती |किसी की देह को हासिल करके भी उसका प्रेम नहीं पाया जा सकता क्योंकि प्रेम में हासिल करना जैसा भाव नहीं होता |प्रेम तो खुद को ही समर्पित कर देता है |उसे जीतकर नहीं पाया जा सकता |यही कारण है कि जीवन भर साथ रहने के बाद भी कई दंपति प्रेम का आस्वाद नहीं चख पाते और अंत तक प्रेम के लिए तरसते हैं |कोई –कोई अन्य के साथ पल भर के रिश्ते में सार्थक हो लेते हैं |प्रेम को समझना,समझाना आसान नहीं है|’जो पावै सो जानै’|

Wednesday, 18 January 2017

मैं शायर तो नहीं फिर भी..

जब मिल जाती हैं रूहें देह की क्या औकात
रहे जहां कहीं भी और किसी के साथ |
जिस एक में मेरी सारी दुनिया
उसके लिए मैं दुनिया में एक |
प्रेम की नदी को तैरकर निकल गए
गहरे उतरते तो मोती जरूर पाते|
छ्लछलाई रहती है आँखों की नदी |
क्या आँखों में रहने लगा है कोई ?
देह को पा लेना आसान है बहुत
रूह तक पहुँचते तो खुदा को पाते |
कौन लिखवा रहा है शेरो शायरी मुझसे
भीतर मेरे ये कौन शायर आ बैठा है ?
शेरो शायरी का शऊर नही मुझको  
जज़्बात बस शेरों में ढल जाते हैं
जिसने प्यार का इजहार नहीं किया
क्या उसने कभी प्यार नहीं किया ?
कभी गोपियाँ कभी रानियाँ रही अनेक
फिर भी कृष्ण की राधा हुई बस एक | 
रोकती है दुनिया रोकते हैं रीति-रिवाज भी
पर मिल ही जाते हैं वे सपनों में आज भी |
तन में मन में सांस में धड़कन में
कहाँ कहाँ बताएं जहां वह है
पर क्या करें जो मुकद्दर में नहीं है |
प्यार सोना है टूट-टूटकर भी जुड़ता है
विरह की आग में जितना तपे निखरता है |