Tuesday, 21 March 2017

मैं शायर तो नहीं फिर भी

1-अहसास के सिवा जिंदगी कुछ नहीं
हम तो बस इसी धन से धनी हैं|
2-वे खुशनसीब हैं सबसे सब कुछ कह लेते हैं 
हम तो खुद से खुद को छिपाते रहे बरसों।
3-आज फिर तकिया आंसुओं से तर था
लगता है रात सपने में आया था वो
4-देह के लिए वो मन की बात करते हैं
मन ही पा लेते तो देह क्या चीज है ?
5-तितली नहीं जो मकरंद पी उड़ जाएंगे
मधुमक्खी हैं प्रेम लगन से शहद बनाएँगे |
6-हम प्यार में खुद को लुटा तो दें मगर 
प्यार के काबिल कोई इंसान तो मिले |
7-दो कदम भी जो तेरी ओर नहीं बढ़ाता
नदी तुम्हें ऐसे समंदर की प्यास क्यों ?
8-प्रेम की नदी को तैरकर निकल गए
गहरे उतरते तो मोती जरूर पाते|
9-छ्लछलाई रहती है आँखों की नदी
क्या आँखों में रहने लगा है कोई ?
10-प्यास बुझाता है पास का दरिया
दूर का समंदर है प्यास का जरिया |
11-नदी की शिकायत पर सागर बस मुस्काता है
उसे भी है नदी की प्यास खुद से भी छिपाता है।
12-पानी की प्यास उस घड़े से पूछिए
तपाया गया जिसे देर शाम तक।
13-जब मिल जाती हैं रूहें देह की क्या औकात
रहे जहां कहीं और किसी के भी साथ |
14-जिस एक में मेरी सारी दुनिया
उसके लिए मैं दुनिया में एक |
15-देह को पा लेना आसान है बहुत
रूह तक पहुँचते तो खुदा को पाते |
16=जिसने प्यार का इजहार नहीं किया
क्या उसने कभी प्यार नहीं किया ?
17-कभी गोपियाँ कभी रानियाँ रही अनेक
फिर भी कृष्ण की राधा हुई बस एक | 
18-रोकती है दुनिया रोकते हैं रीति-रिवाज भी
पर मिल जाते हैं वे सपनों में आज भी |
19-तन में मन में सांस में धड़कन में
कहाँ कहाँ बताएं जहां वह है
पर क्या करें मुकद्दर में नहीं है |
20-प्यार सोना है टूट-टूटकर भी जुड़ता है
विरह की आग में जितना तपे निखरता है |
21-ये दौलतें और शोहरतें लगेगी बेमानी
पा लोगे जो मोहब्बत की सच्ची दौलत |
22-जुस्तजू किसकी और कौन मिला मुझको 
प्यास सागर की और दरिया मिला मुझको |
23-कैसे कह दूँ कि प्यार तेरा धोखा था 
तेरी आँखों में कभी खुद को मैंने देखा था |
24-होगे मथुरा का राजा तुम, मैं भी अपने मन की रानी
देखूँ कैसे भूल तुम जाते, न भूलाने की मैंने है ठानी||
25-किसी दिन काँपते हाथों से गिर जाएगी कलम
उठाएगा कोई बच्चा औ जी उठेगी फिर मेरी कलम |
26-मिलता कोई जौहरी तो कोयला हीरा बन जाता 
चमक छिपाए अंतर में कोयला ही न रह जाता |
27-इससे पहले कि कोई राह ही ना रहे
करो कुछ ऐसा कि फासला ही ना रहे|
28-आँखें सुरीली बातें सुरीली साँसें सुरीली धड़कनें सुरीली 
सुर की नदी में सुरेले के संग मैं भी आखिर हुई सुरीली |
29-आँखों से छेड़कर सुरीला तान
|तुमने तो तन की बीन बजा दी |
30-संबंध तो न बन सका मगर  
अनुबंध को खूब जीया है मैंने |
31-ये प्यार भी कितना बेदर्द है
लौट आता है बार-बार फिर से|
32-कभी अकेले मिलो तो बताऊँ कि मर्ज क्या है
तुम भीड़ में पूछोगे तो "खैरियत" ही कहेंगे |
33-हम मिल भी पाते तो भला कैसे
उसके सपनों में आकाश था सारा
मेरे सपनों में बस चाँद सा मुखड़ा।
34-कभी कभी ये आँखें औचक भर आती हैं
शायद किसी को मेरी याद सताती है।
35-प्यार नहीं मरता है बनकर दर्द दिल में रहता है
कभी खिलाता अधरों पे फूल कभी मोती सा झरता है।
36-गुजर रही है जिंदगी किसी न किसी तरह
यादें साथ हैं किसी हमसफ़र की तरह।
37-वो जानकर भी अनजान है मुझसे
मैं अनजाने ही जान गयी हूँ उसको।

38-वो पूछते हैं मेरे प्रेम का क्या अर्थ
कैसे कहूँ प्रेम में अर्थ नहीं होता।
39-हम होते दो तो न होते एक
एक थे एक ही रह गए।
40-प्रेम का टीका जो बचपन में लगा होता 
ये मर्ज न आज इस तरह लाइलाज होता |
41-वो न मिल पाया तभी तो कशिश है
कशिश न मिटे इसी की कोशिश है।
42-वो न मिल पाया इसका क्या रोना
जिसको मिला है वो भी रो रहा है।
43-आँखें न बता दें रतजगे की बात
इसलिए होंठों ने सूरज उगा लिए हैं।
44-सामने उसके तो जी भर के मुस्कुराए
होते ही अकेले क्यों नयन भर आए?
45-दावे तो बहुत किए थे इस नादां दिल से
आज फिर लगा उसे हम न भूल पाए।
46-यूं तो खिड़कियाँ बंद करके बैठी हूँ 
फिर भी झिरियों से झांक रहा कोई।
47-ऋतुएँ बदलीं बदल गए तुम भी
बदले नहीं तो बस एक हम ही |
48-नफरत का बोलबाला है आजकल चारों ओर
प्रेम पर्व आए तो नाचे सबके मन का मोर ||
49-अब नहीं समय कि इंतज़ार करें
चलो अगली बार ही दीदार करें।
50-इजहार करके उसको खो दिया 
काश उसे मन में छिपाए रखते।
51-एक तरफ़ा भी हो तो क्या होता है प्रेम ही 
सौ में पचास पाकर क्या पास नहीं होते।
52-आंसू बन गिर जाएंगे कुछ
कुछ जाएंगे मेरे ही संग
ये दर्द जो तेरे नाम के हैं।
53-तैरना सीखे बिना नदी में उतर गए
गनीमत रही नदी ने डुबोया नहीं मुझे।
54-प्रेम मन से कहाँ दूर जाता है 
किसी को देख उमग आता है |
55-तुमने देह नहीं मेरे रूह को छुआ है  
तुम्हें क्या पता तुमने क्या किया है | 
56-खुश रहो इसलिए ये भी कर दिया 
तुम्हारे लिए तुम्हें ही दूर कर दिया |
57-दुःख की नदी को मैं हद में रखती हूँ 
उनकी जिंदगी में सैलाब आ न जाए।
58-खुद को भूलाकर बहना पड़ा मुझे
होश में रहती तो कभी की डूब जाती।
59 तेरी कमी तो रह ही गयी आखिर 
यूं तो जिंदगी ने बहुत कुछ दिया।
60-जिसके इन्तजार में ये उमर गुजार दी
वह बाहर नहीं मिला भीतर ही मिल गया।
61-वह पूछता है मुझसे क्यों उसको चाहती हूँ
कोई उससे भी पूछे क्या चाहत पे जोर है?
62-वह कसक बनके अब रहता है इस दिल में
अपना न हुआ और कहीं गया भी नहीं।

मुग्ध पुरूष

कुछ दिन पहले डीका कुमारी नामक एक लड़की[ जो दसवीं की छात्रा थी और बिहार के हाजीपुर के राजकीय अम्बेडकर विद्यालय छात्रावास में रहकर पड़ती थी...]के साथ न केवल बलात्कार हुआ बल्कि उसके स्त्री अंग  को बुरी तरह क्षतिग्रस्त करके उसे लहूलुहान मरणावस्था में छोड़ दिया गया|वह अपने ही छात्रावास के नाली में मरी पड़ी मिली |उसने एक दिन अपनी माँ को बताया था कि एक टीचर उसको नम्बर बढ़ाने का प्रलोभन देकर उसे शारीरिक सम्बन्ध बनाने की बात कहता है |उसने अपनी माँ को कहा -आओ और मुझे यहाँ से ले जाओ| जब तक उसकी माँ आती उसे मार दिया गया| देश में रोज न जाने कितनी डीका कहीं महानगरों में तो कहीं गांवो में तो कहीं दूर दराज के इलाकों में इसी बेरहमी का शिकार हो रही हैं | मीडिया के माध्यम से कुछ की ख़बर हम तक पहुँचती है तो बहुतेरी ख़बरें बेख़बर कर दी जाती हैं| यह एक डीका की बात नहीं है और ना ही शिक्षण संसथाओं तक यह सीमित है |हर क्षेत्र में हर जगह ऐसी मानसिकता के लोग मौजूद हैं
 |क्यों हो रहा है ऐसा ?क्यों होता आया है ऐसा ? पितृ सत्तात्मक व्यवस्था और उसकी पोषक वर्तमान सत्ता संरचना क्यों इसका पोषण करती है |आईए इस पर विचार करते हैं |
रीति कालीन नायिका भेद में मुग्धा नायिका का वर्णन आता है पर नायक भेदों में मुग्ध नायक का नहीं |पर पुरूष खुद पर ज्यादा मुग्ध रहते हैं ?किसलिए हते हैं ,इसका शोध परिणाम बड़ा दिलचस्प है  |रूपवान हो तो रूप पर ,गुणवान हो तो गुण पर ,शक्तिमान हों तो शक्ति पर, यहाँ तक तो फिर भी समझ में आता है पर जिनमें इनमें से कुछ भी नहीं, वे अगर खुद पर मुग्ध हैं तो इसका कारण यह है कि ये अपने पुरूष होने पर मुग्ध हैं |यह मुग्धता समाज की देन है |उसी ने उनमें श्रेष्ठता का भाव उपजाया है क्योंकि उनके पास एक ऐसी चीज है ,जिसकी इस देश में पूजा होती है और ज्यातर स्त्रियाँ ही बड़े विधि-विधान से इस पूजा को करती देखी जाती हैं | जिस पारिवारिक माहौल में वे पलते –बढ़ते हैं , उसमें स्त्री की भी भूमिका पाकर मन को ठेस लगती है | घर-परिवार में उनके लिए विशेष खान-पान ,पौष्टिक भोजन का प्रावधान वे ही करती हैं |वे ही उनकी गलतियों पर पर्दा डालती हैं |बाहर से अपराध करके लौटेने पर उन्हें अपने आँचल तले छिपा लेती हैं |
हमारे नीम-हकीमों से लेकर योगी-मुनि तक सदियों से इके ही बलबर्धन के लिए भस्म चूर्ण बनाते रहे हैं | हर तरह से जिसका सबलीकरण किया हो ,वह क्यों न खुद पर मोहित हों |कभी-कभी यह मोह इतना बढ़ जाता है कि वे यह सोचने लगते हैं कि स्त्रियॉं को बस यही चीज चाहिए |और इसी से वे वश में की जा सकती हैं |इसी कारण गाहे-वगाहे उसका प्रदर्शन करते हैं और उसकी ताकत आजमाते रहते हैं | जिन्हें अपने पर उतना विश्वास नहीं रहता है वे समूह में जौहर दिखाते हैं |स्त्री हंस-मुस्कुराकर उनसे बात भर कर ले तो उन्हें लगता है कि वे बस उसी के लिए मरी जा रही हैं |माँ कहती थी स्त्री को अपने से ज्यादा सुंदर पुरूष नहीं चुनना चाहिए वरना वह सुखी नहीं रहती |सुंदर और गुणी पुरूष दोहरे मुग्धपन का शिकार होता है और कभी एकनिष्ठ नहीं हो पाता |

ये मुग्ध पुरूष अपनी जरा सी भी अवहेलना नहीं सह पाते |’ना सुनना इन्हें अपमान लगता है |इस अपमान का बदला तेजाब से बलात्कार तक है | सभी नायिकाएँ मुग्धा नहीं होतीं ,पर लगभग सभी पुरूष आत्ममुग्धता के शिकार होते हैं |मुग्धा नायिका की एक सीमा है ,मुग्ध पुरूष की नहीं |क्योंकि स्त्री के पास जो चीज है ,वह अपवित्र की जा सकती है ,लूटी जा सकती है ,दांव पर लगाई जा सकती है,बेची जा सकती है ,नष्ट की जा सकती है इसलिए वह रक्षणीय है ,सीमित है,पूजनीय तो कदापि नहीं |हालांकि तंत्र साधना में उसकी भी पूजा का प्रावधान है ,पर यह पूजा श्मशान में की जाती है ,समाज में यह मान्य नहीं |एक बापू पर इस तरह की पूजा का आरोप है,पूजा वे भोग लगाने के लिए करते थे [ इस समय वे जेल में है ]आत्ममुग्ध पुरूष अपनी उम्र नहीं देखता ,सामर्थ्य नहीं देखता बस अक्षत कन्याओं को देखता है |पता नहीं उसे क्यों भ्रम होता है कि कन्याएँ उस पर मुग्ध हो सकती हैं ?वह सारे दांव चलता है |वह भूल जाता है कि कोई कन्या अपने समवयस्क पर ही मुग्ध हो सकती है,उसी से प्रेम कर सकती है |अगर कोई कन्या उसका विरोध करती है तो वह खूंखार हो उठता है |वह उस चीज को नष्ट करने के लिए इतने बीभत्स तरीके अपनाता है कि इंसान र्रा उठे |मेरी क़लम उस वीभत्सता का वर्णन करने से इंकार कर रही है |