Monday, 4 July 2011

मेरी जगह










इतनी जगह कैसे बची रह गयी
मेरे मन में
इतने हादसों के बाद
कहाँ बचा रह पता है
कुछ भी साबुत
...फिर कैसे बची रह गयी मैं
पूरी की पूरी
निश्छल वैसी ही
इस वय और इन हालातों में
जब कि हमारे बीच
दो ध्रुवों की दूरियां हैं
क्या है जो उमग रहा है
फिर भी
अच्छे लगने लगे हो
तुम इतना
एक बार फिर
क्यों बेमानी हो उठा है
सब कुछ
इस वय में फिर
एक बार|




8 comments:

  1. Chhoti lekin Achhee kavita.samvedna ke bimb acche hain.Dhanyabad.

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  2. sabdo ke pankh par bhavo ke udan sekavita ke dwara dil me utarkar anand ka srizan karne ke liye bahoot aabhar

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  3. "जब कि हमारे बीच/ दो ध्रुवों की दूरियां हैं/ क्या है जो उमग रहा है/ फिर भी/ अच्छे लगने लगे हो/ तुम इतना/ एक बार फिर" यह लिख कर फिर यह कहना कि "क्यों बेमानी हो उठा है/ सब कुछ/ इस वय में फिर/ एक बार." एक साथ संयोग व वियोग के विरोधाभासी चित्र खींचता है। अनुभूतियों की इस प्रखरता की प्रस्तुति के लिए बधाई।

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  4. इतनी जगह कैसे बची रह गयी
    मेरे मन में
    इतने हादसों के बाद
    dil me jagah ho to sab apane ban jate hai.. achhi kavita badhai Ranjana jee

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