Monday, 1 August 2011

सिर्फ कागज पर नहीं



सिर्फ कागज पर नहीं
लिखी जाती है कविता
किसान लिखता है 
 जमीन पर
शिल्पकार पत्थर ..मिट्टी
बढ़ई लकड़ी पर
स्त्री घर के कोने –कोने में
रचती है कविता
माँ की हर लोरी
बच्चे की किलकारी
तुतली बतकही
घरनी की चुपकही
प्रेमियों की कही –अनकही में


होती है कविता
पौधे के पत्ते- पत्ते
फूल की हर पंखुरी         
तितली के रंगीन परों पर
इठलाती है कविता 
गौर से सुनो तो  
कोयल की कूक
पपीहे की हूक
पक्षी की चहचहाहट
घास की सुगबुगाहट
भौरों की गुनगुनाहट में भी
लजाती ...मुस्कुराती
खिलखिलाती है कविता
सिर्फ कागज पर
 नहीं लिखी जाती है कविता

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