Tuesday, 30 August 2011

स्त्री कुछ कविताएँ



स्त्री
निचोड़ देती है
बूँद –बूँद रक्त
फिर भी
हरे नहीं होते
उसके सपने |
स्त्री की आवाज
कुँए से निकल कर
दरिया तक
पहुँचती है
और मौजों पर
सवारी गांठ
जा पहुँचती है
समुद्र तक |
स्त्री के दुःख की जड़े
धंसी होती हैं
इतने गहरे
कि छिपाए रख सकती है
सबसे
उम्र भर |
स्त्री
जीना चाहती है
इसलिए बार –बार
मरना पड़ता है
उसे |
स्त्री
मरुस्थल में
फूल खिलाने की
कोशिश में
बन जाती है
मुट्ठी –भर रेत |
चुपचाप चलती हूँ
भीड़ में
स्त्री
बुदबुदाती है
मेरे भीतर |
स्त्री
महलों से
निकलती है
बरसों बाद
खंडहर होकर |
स्त्री जानती है
न कुछ से
कुछ न कुछ
निकाल लेने की कला |
स्त्री
तमाम दचकों को
झेलकर भी
बचा ले जाती है
अपना
घर –परिवार |
१०
स्त्री
काट रही है
जंजीरे
थोड़ी –थोड़ी रोज
और तड़प रही है
कट गयी
जंजीरों की
स्मृति में |
११
स्त्री की
दुनिया में
सब कुछ है
घर –परिवार
नाते –रिश्ते
समाज –संसार
बस नहीं है
वह खुद |
१२
कहते हैं वे
स्त्री के चरित्र
और पुरूष के
 भाग्य का
पता नहीं होता
तो क्या
पुरूष के चरित्र
और स्त्री के
भाग्य का होता है |
कोई पता !
१३
गेहूं की तरह
उगाई जाती है
काटी जाती है
पीसी जाती है
बेली जाती है
सेकी जाती है
और तीन –चार
निवालों में ही
निगल ली जाती है
स्त्री |
१४
स्त्री के पास
जल से भरी
दो आँखों के आलावा
होती है
एक तीसरी आँख भी
जान –समझ लेती है
जिससे
अपने –पराये का
सारा सच
और बहाती है
रक्त के आंसू |
१५
स्त्री
धान का बीजड़ा
एक खेत से उखाड़कर
रोप दी जाती है
दुसरे में
यह सोचकर
कि जमा ही लेगी
अपनी जड़ें |

No comments:

Post a Comment