Tuesday, 30 August 2011

प्रेम कविताएँ


प्रेम कविताएँ
मन की गुनगुनी आँच पर
पकते हैं
कच्चे हरे शब्द
बनती हैं तब
प्रेम की
सब्ज –नील कविताएँ |
अपने ही अंदर से फूटती
कस्तूरी-गंध  से विकल होकर
भागी थी
तुम तक
किन्तु
तृष्णा से विकल हो
खत्म हो गयी अंततः
क्योंकि वहाँ सिर्फ मरीचिका थी
तुम न थे |
तुम्हारी
तलाश में
कई बार
गिरी हूँ
दलदल में
और हर बार
जाने कैसे
बच निकली हूँ
कमल –सा
मन लिए |
जेठ की
चिलचिलाती धूप में
नंगे सिर थी मैं
और
हवा पर सवार  
बादल की छाँह से तुम
भागते रहे निरंतर
तुम्हारे ठहरने की उम्मीद में
मैं भी भागती रही
तुम्हारे पीछे
और पिछडती रही
हर बार |
हरी –भरी है
मेरे मन की धरती
हालाँकि
दूर हैं
सूरज
चाँद
तारे
आकाश
बादल
और ..
तुम |
पूरी उम्र
लिखती रही मैं
एक ही प्रेम कविता
जो पूरी नहीं हुई
अब तक
क्योंकि
इसमें मैं तो हूँ
तुम ही नहीं हो
क्या ऐसे ही अधूरी रह जायेगी
मेरी प्रेम –कविता ?
प्रेम
खत्म नहीं होता
कभी ..
दुःख
उदासी
थकान
अकेलेपन को
थोड़ा और बढ़ाकर
जिन्दा रहता है |
यह शहर
मुझे अच्छा लगता है
क्योंकि यहाँ तुम रहे थे
भले ही आज हमारे घरों के बीच
मीलों का फासला है
भले ही तुम्हें देखे
गुजर गए हैं
बरसों –बरस
भले ही हमारे बीच
खड़ी हैं सैकड़ों दीवारें
भले ही यह शहर
हो गया है असुरक्षित
कहने को कोई नहीं है यहाँ
जाने क्यों  तुम्हारी
खुशबू से सराबोर है
आज भी
यह शहर |


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