Sunday, 7 August 2011

चुनमुन चिरैया


चुनमुन चिरैया
तुम चहकती रहना
क्या हुआ जो सूखने लगे हैं वृक्ष
बदलते जा रहे हैं ठूंठ में
प्रवासी न हो जाना
तुम हो तो लगता है कहीं तो कुछ है
जहाँ
बचा रह सका है हमारे भीतर का आदिम
जहाँ अब भी टूटता है सन्नाटा
चौंक जाता है मुर्दाघर यह शहर
खिलखिला उठते हैं फूल
तुम्हारी तीक्ष्ण मधुर लंबी तान के तारों पर
कस उठती हैं ऋतुएं मचलती हैं हवाएं
कुनमुनाता है कोई
धरती की कोख में
जब तक तुम्हारी आवाज है जिन्दा
जिन्दा है आदमी     रहेगा आदमी जिन्दा की तरह
चुनमुन चिरैया . 

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