Saturday, 17 December 2011

बथुए का साग बेचते बच्चे


जिलाधिकारी के आदेश से
बंद है जनपद के सारे स्कूल
कड़ाके की इस ठंड में
दुबके हैं बड़े तक
गर्म बिस्तरों में
वे खोंट रहे हैं
बथुए का साग
अलस्सुबह से
ठंड से नीले पड़ गए हैं होंठ
थर-थर काँप रहा है जिस्म
ओस से गीली मिट्टी में
रपट रहे हैं नंगे पाँव
आधे-अधूरे कपड़ों में
लुग्गा की गांती बाँधे बच्चों के
हाथ ठिठुर रहे हैं
खोंटते हुए साग
आयरन और विटामिन ‘ए’
खूब होता है बथुए के साग में
-बताते हैं डाक्टर
जिनकी बहुत ही कमी है
इन बच्चों में
पर खाने के लिए नहीं
बेंचने के लिए खोंट रहे हैं
ये बथुए का साग
रूखा-सूखा या बासी खाकर
दुपहर बाद ये जायेंगे बाजार
और बैठ जायेंगे यहाँ-वहाँ
सामने लगाकर बथुए का ढेर
सहेंगे ग्राहकों के नखरे
तेवर और घुड़कियाँ
सर्वशिक्षा अभियान
गरीबी उन्मूलन की सरकारी योजनाएं
निरर्थक हैं इन बच्चों के लिए
पूछ बैठती हूँ –‘क्यों नहीं जाते स्कूल
जब मिलता है मुफ्त दोपहर को भोजन’
हँसता है उनमें से थोड़ा बड़ा बच्चा
‘भूख सिर्फ दोपहर को ही नहीं लगती मैडम !
पूरा परिवार लगता है,तब जुटती है
दो वक्त की रोटी’
सोचती हूँ –जिस देश में बच्चों के आगे
रोटी का सवाल हो
वहाँ कैसे ‘सब पढ़े –सब बढ़े|’ 

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