Tuesday, 13 December 2011

सब्जी-बाजार में आलूवाद

सब्जी-बाजार में 
अटे पड़े हैं 
नए आलू 
पारदर्शी जिल्द वाले 
जिनसे साफ़-साफ़ झलक मारता है 
किसी का सफ़ेद 
किसी का गुलाबी 
पीला 
हरा 
या चटख लाल रंग 
सबसे अधिक भाव है लाल आलुओं का 
जैसे आयरन भरा हो उनमें खास 
ग्राहकों की भीड़ 
टूटी पड़ रही है नए आलुओं पर 
बाजार में पुराने आलू भी हैं 
बेडौल मोटी चमड़ी वाले 
जिनमें नहीं बचा है 
पहले जैसा रूप ..रंग ..स्वाद 
एक भी ग्राहक नहीं उनके पास 
जबकि गिरा हुआ है उनका भाव 
पुराने आलू कुढ़ रहे हैं 
देख-देखकर नए आलुओं को 
कुछ का गुस्सा तो फूट पड़ा है 
अंखुए की शक्ल में 
उनके पूरे बदन से 
कुछ दे रहे हैं नसीहतें -
'इतराओं  मत,चार दिन की है चाँदनी'
नए आलू युवा हैं तो थोड़े मसखरे हैं 
रह-रहकर उन्हें चिढ़ा देते हैं -
'इतनी मोटी चमड़ी है आपकी 
कि छिलो तो गुद्दा उतर जाए 
हमें देखी चुटकी से उतर जाते हैं 
लगता है बूढ़े हो गए हैं आप 
रिटायर होने के दिन आ गए हैं'
पुराने आलू जानते हैं 
कि अब उतरना होगा उन्हें मिट्टी में 
नहीं जानते कि उनके अंग-प्रत्यंग में है 
अनगिनत आलू पैदा करने की क्षमता 
बिना मिटाए पुराना शरीर 
नहीं घटित होगा यह चमत्कार 
वे दुखी हैं इस अहसास से 
नहीं रहेगा इतने दिनों से पोषित यह शरीर 
जिनसे जुड़ी हैं पंचरस युक्त स्मृतियाँ 
सब कुछ चुकते जाने का अहसास 
उनपर इतना भारी है कि भूल गए हैं 
कि 'नए' पराये नहीं उनके ही अपने हैं 
भूल गए हैं 'नए'भी कि वे 
बूढ़ी आँखों के ही युवा सपने हैं 
सब्जी-बाजार में छिड़ा हुआ है 
दोनों पीढ़ियों में जबरदस्त विवाद 
सभी सब्जियां हरी,पीली,सफेद.नीली 
कह रहीं जिसे आलूवाद |



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