Sunday, 15 January 2012

द्रोपदी और सभा



नए हस्तिनापुर में एक बार फिर पुरानी घटना दुहराई गई |इस बार द्रोपदी घसीटकर नहीं,सम्मान से बुलाई गई |मंशा थी वही देखने को अग्निगर्भा को अपमान में निर्वसन|द्रोपदी को संदेह था कुछ-कुछ,पर भरोसा था खुद पर कि कर लेगी सामना चाहे जैसी आए परिस्थिति|सभा शुरू हुई और अपने-अपने क्षेत्र के महारथी देहबल से नहीं बुद्धिबल से खींचने लगे द्रोपदी की चीर |वे देखना चाहते थे महाभारत की द्रोपदी की तरह आज की द्रोपदी को भी निस्तेज,बेवश और लाचार |थे आश्वस्त भी कि नहीं है कलयुग में कोई कृष्ण,जो आएगा बचने द्रोपदी की लाज |इसलिए और भी शेर हो रहे थे वे,जो दरअसल सियार थे |अपनी कुंठा,बदसूरती को छिपाने के लिए रंग लिया था खुद को लाल रंग में यानी रंगे हुए सियार थे |द्रोपदी सोच रही थी कि ये जो महारथी बन उस पर जोर आजमा रहे हैं,कई तो चरणों में उसके गिड़गिड़ा चुके हैं |उसके इंकार का बदला लेने के लिए साजिशन आज एकजुट हुए हैं|एक अकेली स्त्री को पराजित करने के लिए इतने पुरूषों का संगठित प्रयास !शक्ति-रूपा स्त्री को नग्न करने की फिर-फिर आस!वे हँस रहे थे,मुस्कुरा रहे थे,विजयी भाव से |भूल गए थे शायद कि वह आज की द्रोपदी है,जिसने प्रसाद की तरह बंटने से इंकार किया है |उसे ही अपनाया है,जिससे प्यार किया है |मुहताज नहीं कृष्ण की,अपनी कृष्ण खुद है |स्त्री की शालीनता में कब तक निर्लज्जता को सहती ?सियारों की हुआ-हुआ शेरनी कब तक सहती ?वह दहाड़ी,तो सभा हिल उठी |महारथी फिर सियार हुए और सभा विसर्जित हुई | 

1 comment:

  1. आज चीर हरण की जरूरत नहीं वल्कि पर्दा डालने की जरूरत है

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