Wednesday, 11 January 2012

जनतंत्र के खेल में

जनतंत्र के इस खेल में 
आखिर मैं कहाँ खड़ा हूँ 
पाँव-भर की जमीन 
आँख-भर के आसमान 
के अरमानों ने 
बदल दिया है मुझे 
एक दर्शक में 
तटस्थता टूटती है मेरी 
जब कोई भारी शोर और 
हंगामों के बीच 
लगवा लेता है अंगूठा 
जबरदस्ती मुझसे 
टोपी बदल खेल के लिए 
मेरी औकात महज 
इन पचपन वर्षों में 
सत्ता के पट्टों पर 
सियासी दाँवपेंच के धुरंधर 
खिलाड़ियों की कुर्सियों के 
इंतजाम के लिए 
रह गयी है 
सिर्फ अँगूठा लगाने की 
जनतंत्र के इस खेल में 
मैं कहाँ खड़ा हूँ ?
पचपन वर्षों की आजादी के 
सपनों में उतराते
खाली पेट 
सूखे चेहरे के साथ 
पूंछ रहा हूँ मैं 
यह पूछते हुए 
अपने ही जिन्दा न 
रह जाने का अहसास 
और वजूद पर 
भारी भय लिए
आखिर हो रही हैं 
मुठभेड़े भी तो !
जनतंत्र के,तन्त्र के 
कायदे-क़ानून 
तोड़ने की सजा भी तो तय है! 
मेरे यह पूछने से 
कहीं हो गया उन्हें महसूस 
कि आतंकवाद बढ़ सकता है 
या फिर संसद की शांति 
भंग हो सकती है 
वे दे सकते हैं 
लम्बी जेलें या फिर मार सकते हैं 
सीधे गोली 
जनतंत्र के इस खेल में 
पूछना गुनाह है 
खेल के नियम |

No comments:

Post a Comment