Tuesday, 10 April 2012

माँ का दर्द


आकाश ने 
यह कैसा जल बरसाया 
कि खेतों में खड़े गेहूँ जल गए 
काला पड़ गया उनका सुनहरा रंग
कुछ तो ज़मने लगे खेतों में फिर 
गेहूँ की सुनहरी आभा से चमकते
किसानों के चेहरे भी स्याह पड़ गए 
होती धान की बालियाँ तो सह लेतीं इस अग्नि-वर्षा को 
उन्हें तो आदत है कमर तक भींगे रहने की 
एक जगह से उखड़कर दूसरी जगह जा जमने की 
बेटियों की तरह वे सब सह जाती हैं 
पर गेहूँ तो बेटे हैं नाजों में पले 
खुद गीले रहकर सूखे में सुलाती है जिन्हें 
खेत की मिट्टी एक पल के लिए भी 
खुद से ना अलगाती है 
परिपक्व होकर चले भी जाते हैं 
उसे छोड़कर तब भी 
उनकी ठूँठ यादों को 
जकड़े रहती है कसकर 
जब तक उन्हें जलाकर
चलाकर उसपर ट्रेक्टर
एकसार ना कर दिया जाए 
अगली फसल के लिए 
माँ का दिल आज आँसुओं से तर है 
कि बेटे भरी जवानी में हो गए जर्जर हैं|

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