Monday, 2 April 2012


प्रकृति के रंग 
सेमल
पत्ते पुत्र हैं
कलियाँ बेटियाँ
जानता है सेमल  
बेटे रहेंगे देर तक साथ 
बेटियाँ विदा हो जाएंगी
फूल बनते ही 
फिर भी भेद नहीं बरतता है 
तब भी नहीं जब
कलियों के युवा होते ही
दूर-दूर से आने लगती है
रसिकों की टोली
जानता है
जब तक बेटियाँ हैं 
घर जगमग है
जाते-जाते भी दे जायेंगी
वे फल
जिसमें सृजित होगी
श्वेत...कोमल ऊष्मा
जिसे जानेगा संसार 
उसके ही नाम से |
 २ 
पेड़
कड़ी धूप में 
तपते हुए भी 
अपनी कद-भर छाया 
ओढा रहे हैं धरती को 
जुड़ा रही है धरती 
देखकर पुत्रों का प्रेम 
उमड़ रहा है स्तनों में दूध 
सींच रही है जिससे 
अपनी कोख में फैली 
उनकी जड़ों को 
पाकर जिनसे शक्ति 
लड़ लेते हैं पेड़ 
हर आपदा से 
कैसा अद्भुत होता है
माँ-पुत्र का रिश्ता|   
फागुन
कत्थई देह पर 
गुलाबी...धानी हरे और पीले शेड्स वाले 
फागुनी कपड़े पहने
साँवली बाहों में लाल फूलों की पिचकारी उठाए 
आकाश को रंग रहा है सेमल  
खुश है
कि इस फागुन में 
पूरा कुनबा है साथ
बाल-युवा-वृद्ध पत्ते 
कलियाँ-फूल सब 
चींटे..भ्रमर ..कौओं जैसे 
अतिथियों की भी आगत है 
फागुन तुम्हारा स्वागत है |


हरा पत्ता और पेड़
हरा पत्ता लाख छटपटाए
पेड़ भी चाहे
नहीं जुड़ सकते दोनों
अलग होने के बाद
पत्तों की भीड़ में भी
कसकता रहता है पेड़ का मन
उस पत्ते के लिए
जो उसकी ही देह का हिस्सा था
पत्ते को भटकना ही होता है
सूखना ही पड़ता है समय से पहले
उड़ना होता है निर्मम हवा के संग
फिर नदी..पोखर..नाला या खेत
जैसी हो उसकी नियति
वैसे तो पूरी उम्र जीने के बाद
हर पत्ते की यही है परिणति
जानता है पेड़
फिर भी टूटता है
जब कोई हर पत्ता
फूट-फूटकर रोता है पेड़ |
बेटी है कि माँ है घास
माँ धरती की 
नंगी देह को 
हरे मखमल से
ढांक रही है 
बेटी घास 
हरी हो गयी है 
धरती की सूखी देह 
बेटी के शीतल,सुखद,कोमल 
स्पर्श से 
जानती है घास 
कि माँ पर आधिपत्य है जिनका 
नहीं भाता उन्हें माँ-बेटी का इतना प्यार
वे कभी भी सोहवाकर,चरवाकर
या मशीन चलवाकर 
खींच लेंगे उनका सारा मखमल 
वह भी सूख जायेगी 
माँ से बिछड़कर
फिर भी मचल-मचलकर चिपक रही है 
माँ की छाती से घास 
माँ से ही सिखा है उसने माँ बनना 
उसकी स्नेहिल गोद में भी 
खेलते हैं बच्चे बिना चोट खाए 
युवा प्रेम करते हैं निश्चिंत 
सखी मानकर उसे 
बूढ़े दुःख-दर्द बाँटते हैं 
हमदर्द की तरह 
फिर भी धरती की छाती से 
चिपकती है वह बेटी की तरह |
स्पर्श 

सेमल की कलियाँ
वैसे तो सांवली हैं
पर सूर्य के परस से
वैसे ही लाल हो जाती हैं 
जैसे सूखी-साँवली लड़कियाँ
ससुराल जाकर 
गुलाब हो जाती हैं|
जिंदगी की चैत में
प्रौढ़ हो गयी है
हरी मटर
जिंदगी की चैत में
पीला पड़ रहा है रंग
ना पहले-सी कोमलता
ना लचक
कड़ी हो रही है जिल्द
जड़ें,लतरें,टहनियाँ,पत्तियाँ
सब सूख रही हैं
देख रही है मटर
कल तक जो पौधे
लिपटाए रहते थे उसे
झटक रहे हैं दामन
यहाँ तक कि मेड़ों ने भी
तोड़ लिया है नाता
जो अपनी पीठ पर
ममता से चढने देती थीं
वे सब तो पराये हैं  
उसके अपने ..छिलके
जिनकी सुरक्षा में उम्र गुजारी
दिखा रहे हैं उसे बाहर का रास्ता
सखी मिट्टी की गोद में
लोट-लोट कर रो रही है मटर
मिट्टी समझाती है उसे
-पगली क्यों हो रही यूँ हलकान 
सूखने पर भी नहीं खत्म होगा
तुम्हारा मान-सम्मान
रस भले ना रहे तुममें
बचा रहेगा रूप और स्वाद
भींगकर घुघनी-छोले
भूनकर चबैना-सत्तू
दलकर दाल का रूप लोगी तुम
यहाँ तक कि तुम्हीं से होगी
नई हरी मटरों की फसल तैयार |





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