Tuesday, 8 May 2012

मेरी सहेली


धूप में तपकर काम से खटकर 
ज्यों मैं घर पर आती हूँ 
चीं-चीं करतीं मेरी सखियाँ 
मेरे पास आ जाती हैं 
कोई चूमती हाथों को 
कोई कंधे सहलाती हैं 
दाना-पानी कर लो जल्दी 
वे मुझको समझाती हैं 
कंचे जैसी इनकी आँखें   
जुड़ी लौंग-सी चोंच 
जैसे चाहे मुड़ जाए 
ऐसी देह में लोच 
इनकी छुअन से 
फर-फर करके 
मेरी थकान उड़ जाए
सुबह-सवेरे मुझे उठातीं
रात को मगर जल्दी सो जातीं 
दिन-भर चाहे रहें कहीं पर 
शाम-ढले घर आ जातीं 
मैं अब घर में  नहीं अकेली  
साथ हैं मेरे कई सहेली !

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