Saturday, 12 May 2012

खैनी खाती है माँ



घर लौटते ही
भाइयों ने शिकायत दर्ज कराई है
कि खैनी खाती है माँ
देखा जब माँ को
बना रही थी वह खैनी
अपनी अँधेरी कोठरी के एकांत में
चुपचाप बैठी अकेली
डिबिया से सूरती के तीन छोटे टुकड़े
चुनौटी से चूना निकाल
रखा उसने बायीं हथेली के बीचो -बीच
फिर मलने लगी दाहिने हाथ के अंगूठे से
बीच -बीच में ठोंकती भी जाती
देखते ही मुझे ठहाका लगाया
'तीन चुटकी तेरह ताल
तब देखो खैनी का कमाल'
और ठोंका अंतिम बार खैनी को
दाहिने हाथ की चिटुकी से उठाकर
दबा लिया अधरोष्ठों के बीच
व्यवस्थित कर जीभ से
बतियाने लगी मजे से
'माँ क्यों एसी चीज खाती हो
जिससे भाइयों की इज्जत जाती हो '
गम्भीर हो गयी माँ
-उनकी इज्जत अब मेरी हर बात से जाती है बेटी
हंसने -रोने ,जागने -सोने
खाने -पीने ,घूमने -बतियाने सबसे
एक बात पूछूँ तुमसे
बड़ा पीता है शराब
मंझला सिगरेट
छोटा जाने क्या -क्या
क्या मुझे बुरा नहीं लगता
मेरी इज्जत नही जाती ?

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