Thursday, 9 August 2012

एक युवा सन्यासिनी को देखकर



मुंडित सिर 
गेरूआ वस्त्र 
सूखी काया 
निचुड़ा चेहरा 
क्या तुम वही स्त्री हो संन्यासिनी 
जो कहलाती थी कभी कामिनी 
घने श्याम केश 
रंगीन वस्त्र 

मांसल देह व फूल से चेहरे वाली
तुम्हारी युवा देह में
क्या अब धड़कती नहीं इच्छाएँ
कि सूखा डाला है उन्हें भी
अंतडियों की तरह
संयम-नियम और तपस्या की अग्नि से
संन्यासिनी!रात की प्रार्थना के बाद
जब लौटती हो तुम अपनी कुटिया में
क्या उदास नहीं होती कभी
लंबी रातों में खलता नहीं अकेलापन
किलकारी मार कर हँस नहीं पड़ता
तुम्हारा अजन्मा शिशु !
वह क्या था जिसने कर दिया उदासीन तुम्हें
प्रकृति और पुरूष के रिश्ते से
किस सुरक्षा की चाहत में जा पड़ी तुम
धर्म की शरण
सच कहना संन्यासिनी
धर्म तुम्हारे गले की फांस है
कि कवच !

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