Monday, 21 December 2015

माँ को जानना

दावा तो नहीं कर सकती
 मैं समझती थी माँ को
माँ को समझना
पूरी स्त्री जाति को समझना था
बचपन में नहीं समझ पाई थी उन्हें
इसलिए शिकायत रही कई  
मसलन मेरे बेटी होने से क्यों खुश नहीं थीं वे
क्यों बेटों को ज्यादा प्यार करती थीं
 क्यों नहीं समझना चाहती थीं मुझे
पर गहते ही कलम हाथ में
समझने लगी मैं माँ को
जानने लगी कि कमियाँ
 व्यवस्था की थीं माँ की नहीं
कलम गहा भी तो उन्हीं की बदौलत
वरना कहाँ चाहते थे पिता
कहाँ चाहता था उनका अपढ़ समाज
कि पढ़ें बेटियाँ
कम पढ़ी-लिखी माँ चाहती थी
उन्होने ही दिया मुझे 
आधा आकाश
आधी धरती लिखने को
वे सुनाया करती थीं मुझे
तमाम किस्से-कहानियाँ
कुछ आप बीती कुछ जग बीती
अपने अंदर की पीड़ा
सारी व्यथा
सारी आग
उड़ेल दी मेरे भीतर
मेरी रचनाओं के मूल में जो स्त्री है
वह मेरी माँ है
मैं माँ के मौन घुटन की आवाज थी
माँ के शब्द माँ के भाव-विचार ही
मेरी कविता में ढलते थे
समीक्षक हैरान होते कि
इतनी कम उम्र में
इतने सारे अनुभव क्यों कर हुए मुझे
वे नहीं जानते थे
माँ नदी की तरह उमड़ती थी मुझमें   
मैं जब भी खाली होती घर जाती
माँ मुझे लबालब भर देती
मोटे-मोटे ग्रन्थों में नहीं थी वह कुब्ब्त
माँ ने ही बताया
स्त्री का सच उतना ही नहीं होता
जितना दिखता है
जाने कितने तहों में छिपी होती है
 उसके भीतर की असली औरत
माँ ने ही कहा था
औरत कभी बुरी नहीं होती
बनाई जाती है
 छल से बल से
प्रेम नाट्य से
माँ ने कहा था
औरत बस दो चींजों से हारती है
प्रेम से ....और संतान से
वरना वह किसी पर्वत से ज्यादा
मजबूत होती है
सागर से ज्यादा गहरी
और अपराजिता
माँ के कारण ही शुरू हुआ मेरा विमर्श
कि औरत पूर्ण होती है
उसमें कोई कमी नही होती
कमियाँ गढ़ी जाती हैं
लादी जाती हैं
और दुखद यह कि
ये वहीं करती हैं
जो उसके ही कोख से जनी होती हैं |
दुनिया –जहान के लिए
नाते रिश्तेदार के लिए
पति और संतान के लिए
कमियाँ जो गिनाई जाती हैं औरत में
उसकी तह में जब भी उतरी हूँ मैं
 देखा है वहाँ
हाहाकार करती
अपनी ही माँ को
तब जाना है  माँ को समझना   
पूरी स्त्री जाति को जानना है
मानो माँ नदी हो  
और पूरी स्त्री जाति
उसकी धाराएँ |




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