Wednesday, 7 September 2011

वृक्ष बन जायेगी गुठली

घूरे की सूखी जमीन पर पड़ी 
गुठली आम की 
याद कर रही है अपना अतीत 
जब वह पिता के कंधे पर चढ़ी 
पूरे कुनबे के साथ 
मह -मह महका करती थी 
मगर कभी  आंधी 
कभी बंदर 
कभी शैतान बच्चों के कारण 
टूटता गया कुनबा 
उसकी अनगिनत बहने 
बचपन में ही नष्ट हो गयीं 
और अनगिनत जवानी में ही 
काट -पीटकर
मिर्च -मसालों के साथ 
मर्तबानों में बंद कर दीं गयीं 
वह बची रह गयी 
कुछ के साथ 
पर कहाँ जी पाई पूरा जीवन 
भुसौले में दबा -दबा कर 
दवा के जोर पर 
जबरन पैदा किया गया 
उसमें रस 
और फिर चूसकर उसका सत्व 
फेंक दिया गया घूरे पर 
निराश नहीं है 
फिर भी गुठली 
उसमें है सृजन की क्षमता 
इंतजार है उसे 
बादलों का 
फिर फूटेगा उसमें अंकुर 
और वह वृक्ष बन जायेगी |

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