Tuesday, 20 September 2011

कजरी और गोरेपन की क्रीम



चार दिन में ही खत्म हो जाती है
यह गोरेपन की क्रीम
फिर भी नहीं होता जरा-सा भी रंग साफ़
झल्लाती हुई कहती है आदिवासी युवती कजरी
जो सोचती है रंग बदलते ही बदल जायेगी
उसकी बदहाल दुनिया
नहीं जानती कजरी कि मासूम निर्दोष जीवों से
छीनकर जिंदगी की चमक
चमकीले दीखते हैं सौंदर्य-वर्धक प्रोडक्ट
जिन्हें लगाकर अभिमान से भर
गुड़िया बन जाती हैं ‘अमीर”स्त्रियाँ
‘मध्यम’परेशान होती हैं बिगाड़ कर बजट
‘गरीब’कजरी की तरह सपने देखती हैं
कजरी नहीं जानती
रंग-बिरंगी शीशियों में नहीं है
रूप-रंग और तकदीर बदलने की ताकत
वह तो है उसके काले रंग
खुरदुरे हाथ-पाँवों और मजबूत जिस्म में
जिसे कुदरत ने बख्शा है उसे नेमत की तरह
नहीं जानती कि उसके जैसी सुंदरता पा ही नहीं सकतीं
रैम्प पर कैटवाक करती सुन्दरियाँ
जिनकी त्वचा नहीं सह सकती
सूरज का हल्का ताप भी
वे जो दिखाती हैं उसमें सब कुछ है
सिवाय जिंदगी के
स्वाभिमान के
और औरत के
कजरी को जानना चाहिए
कि वह बनना चाहती है जिनकी तरह
वे नकली सफेदी वाले संसार के
चमचमाते प्रोडक्टों के बीच
खुद एक प्रोडक्ट हैं
जिनका बाजार भाव कभी भी गिर सकता है
जानना चाहिए कजरी को
कि रातो-रात सब कुछ बदलने का चमत्कार
बढाता है सिर्फ उत्पादकों के चेहरे की चमकार
कजरी को बढ़ानी चाहिए अपनी सुंदरता
सांध्य-कक्षाओं में जाकर
यह जानकर कि कैसे बढ़ रही हैं अपने बूते
उसकी बहनें दुनिया में निरंतर
तभी तो मार सकेगी
उस ठेकेदार के मुँह पर थप्पड़
जो करना चाहता है
गोरेपन की क्रीम के बदले
उसकी काली देह का सौदा | 

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