Sunday, 8 January 2012

किस मंत्र से

इस कड़कती ठंड में 
थोड़े-से पुआल और
पुराने कम्बल के सहारे 
बैलगाड़ी के नीचे
चैन से सोते हैं   
साँझ-ढले ईंट के चूल्हे पर 
काली पड़ गयी बटुली में
भात पकाते हैं 
सेंकते हैं गोईंठे पर
गोल,सुडौल,चित्तीदार लिट्टियाँ 
तो कभी मोटी-मोटी,लाल-लाल
फूली-फूली रोटियाँ बनाते हैं
बटुली में खदबदाती उनकी 
आलू-गोभी,बैंगन-मटर की
सब्जी को देखकर  
मुँह में भर आता है पानी 
कई जन मिलकर पकाते-खाते हैं
धुल-मिट्टी,कीड़े-मकोड़े से निश्चिंत 
खुलकर हँसते-बतियाते हैं 
दिन-भर बेचते हैं पशु-आहार 
घास,भूसा और छांटी
रात को देर तक बेलौस गीत गाते हैं 
किस मंत्र से ये गाड़ीवान 
कठिन जिंदगी को
'यूँ' जी पाते हैं ?







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