Monday, 16 April 2012

देह-तन्त्र में स्त्री का जनतंत्र



माना कि तुम्हारे देश में
आजाद है स्त्री
कुछ भी करने को
कोई कुछ नहीं कहता उसे
वह किसी भी समय
कैसे भी कपड़ों में
अकेली या किसी के भी साथ
आ-जा सकती है
घूम सकती है
पी सकती है
[सो भी सकती है]
पुलिस उसकी सुरक्षा के लिए है
पीकर गिर जाने पर उसे
सुरक्षित जगह पहुंचाती है
जरूरत पर अस्पताल
सरकार को चिंता है
उसकी सेहत की
हर हफ्ते मुफ्त निरीक्षण कराती है
निरोधक सामग्रियां उपलब्ध कराती है
छोटे-बड़े कई रोजगार है उसके लिए
दूकान-रेस्तरां,बार,डिस्कोथेक
मसाज-पार्लर,होटलों में
वेटर से मैनेजर तक बन सकती है
साईकिल-मोटरसाइकिल पर
फेरी लगा सकती है
सड़कों के किनारे फूल-खिलौने
सिगरेटें बेच सकती है
कहीं कोई दबाव,जोर-जबरदस्ती
या बलात्कार नहीं
न देह पर,ना मन पर
ना ही जीवन पर
उसका निश्चिंत चेहरा देखकर लगता है
सुखी और सुरक्षित है तुम्हारी स्त्री
देश का अर्थतन्त्र उसके हाथ में है
पर क्या यह सच है?
तुम कहते हो –“सैलानियों का स्वर्ग है मेरा देश”
एक बात बताओ -इस स्वर्ग में
क्यों आते हैं अधिकतर पुरूष-सैलानी ही ?
क्या इसलिए नहीं कि अप्सराओं की तरह
कामनाओं को उत्तेजित और संतुष्ट करती
हर तरह की
हर उम्र,हर कीमत की
और हर तरह से पुरूषों का
मन बहलाने को
उपलब्ध है स्त्री यहाँ
तन-मन और क़ानून की
किसी भी उलझन के बिना |
कैसा जनतंत्र है तुम्हारा
जहाँ स्त्री स्वतंत्र नहीं है
खड़ी रहती है
शो-विंडों में पुतलों की जगह  
दिखाए जाते हैं उसके स्त्री-अंग स्क्रीनों पर
ग्राहकों के बेहतर चयन के लिए
दिन-भर कई सारे दूसरे काम करने के बावजूद
रात को ग्राहक तलाशती है वह ?
 इसे आजादी कहेंगे कि  
गरीबी..मजबूरी..लाचारी
या सुविधा-साधनों की प्यास
या कुछ और !
कि गांवों से भी पुरूष अपनी स्त्रियों को
शाम-ढले छोड़ने आते हैं शहर
और सुबह ले जाते हैं
बिना किसी अपराध-बोध के !
जिस तन्त्र में
टूरिज्म और अर्थव्यवस्था
स्त्री-देह पर टिकी हो
बिना भावना व एहसास के
स्त्री देह बेचती हो
उसे पुरूष-जनतंत्र तुम भले कहो
वह स्त्री का जनतंत्र कभी नहीं हो सकता |

No comments:

Post a Comment