Monday, 7 April 2014

अमरता


उन्हें अमर हो जाने की चाह है
इसलिए वे साम दाम दंड भेद की
नीति पर चलते हैं
गिरने को तैयार हैं
किसी हद तक
गिराने को तैयार हैं सबको
दिखाने के लिए खुद को
सबसे ऊंचा और विशाल
कुछ भी करने को हैं तैयार
मैं देखती हूँ उनके चेहरे को
जिसकी मधुरता
और मासूमियत
अमरता की बेदी पर
सिर पटक रही है
वे भूल गए हैं इतिहास
कि कोई नहीं हुआ अमर
अमरता की चाह में |

2 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (08-04-2014) को "सबसे है ज्‍यादा मोहब्‍बत" (चर्चा मंच-1576) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    श्रीराम नवमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. ज़िन्दगी बड़ी होनी चाहिए लम्बी नहीं...ऐसा जीवन भी क्या जीवन है...सुंदर कविता...

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