Wednesday, 9 December 2015

सुंदर

तुम्हारी आँखों के  
हीरे से झिलमिलाते आईने में
बहुत सुंदर दिखा था मेरा रूप
हैरान थी कि
ये मैं ही हूँ
बचपन से सुनती आई थी
कुछ भी सुंदर  नहीं है मुझमें
ये तुम्हारी आँखों का जादू था
कि अनभिज्ञ थी मैं
खुद से  
नहीं जान पाई आज तक |

6 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 10 - 12 - 2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2186 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  2. प्रेम बाहरी आकर्षण नहीं यह तो अंतर्मन की उपज है ..
    बहुत सुन्दर

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  3. प्रेम बाहरी आकर्षण नहीं यह तो अंतर्मन की उपज है ..
    बहुत सुन्दर

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  4. अरे ये तो प्रेम छे, प्रेम छे, प्रेम छे।

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  5. सुन्दर व सार्थक रचना ..
    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है...

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